
दिल में रहती जो बात सदा,
वह आज जुबां से कहना है।
मेरे लिए क्या हो तुम,
बस आज यही बतलाना है।।
तुम हो पहली किरण भोर की,
जो हर अँधियारा हर लेती हो,
मन के सूने आँगन में आकर
चुपके से उजियारा भर देती हो।।
समझती हो मुझको मुझसे भी ज्यादा,
बिन बोले सब पढ़ लेती हो,
आँखों की भीगी दहलीज़ से
दर्द मेरे तुम चुन लेती हो।।
जीवन के कठिन संघर्षों में
तुम ढाल बन साथ खड़ी रहती,
अपने आँचल की छाया तले
हर पीड़ा मेरी खुद सह लेती।।
तुम ममता की गहरी सरिता,
तुमसे मेरा हर अरमान,
तुम हो तो राहें सरल लगें,
तुमसे ही ऊँची मेरी उड़ान।।
शब्द कम पड़ जाते हैं माँ,
क्या कहूं तुम्हारे बारे में।
तुम मेरा साहस मेरी दुनियां,
बस आज यही बतलाना है।।
डॉ. दीप्ति खरे
मंडला(मध्य प्रदेश)













