
विषय- मैं ओर मेरी बूढ़ी माँ
विधा- गध एवं मुक्तक
जिन्दगी का हर कोई तलबगार नही होता
सूरत-ए-इश्क़ का एतबार नही होता जन्नत-ए-मंज़िल तो माँ के चरणो मे है
बगैर उसके खुदा कसम खुदा का दीदार नही होता
माँ एक ऐसा शब्द है कि जब अबोध बच्चा जिसकी आंख भी ठीक से नही खुली होती है तब भी वो अपनी माँ की गोद मे ही अपने को पूर्ण सुरक्षित महसूस करता है ओर किसी के भी मुख से माँ सुन उसके छोटे से मुखमंडल पर चमक आ जाती है। थोडा बड़ा होने पर उसको जो शब्द का उच्चारण आसानी से कर लेता है वो भी माँ ही होता है। माँ ओर औलाद का सम्बंध इश्वर ओर भक्त के सम्बंध से भी कई लाख गुना ज्यादा होता है। ये एक ऐसा सुख है जिसे पाने के वास्ते स्वयं इश्वर भी मनुष्य रूप मे धरती पर आते है।आज तक माँ की ममता के आगे दुनियाँ मे कोई वात्सल्य प्रेम हुआ ही नही इसीलिये शास्त्रों मे भी मात् पित्र सेवा को ईश सेवा से बढ़कर माना जाता है। ये कितनी बड़ी विडम्बना है जब बच्चे छोटे ओर नादान होते हैं तो माँ बाप उसको संभालते है किन्तु वो ही माँ बाप जब बुजुर्ग होते है तो इन्ही औलादों को उनको संभालने की ना फुर्सत होती है ना ही मन ।येही माँ बाप औलादों को एक बोझ लगने लगते हैं।ये तो एक बात लेकिन जिस सोच ने आपको इन्सान वनाया उसी सोच को आप अपने बूढे माँ बाप को तब चलेंग करने लगते हो जब वो लाचार वृद्धावस्था के दौर मे आ जाते है। आज बढ़ती प्रतिस्पर्धा के इस दौर मे जब मानसिक तनाव अपने चरम पर है इसका सबसे ज्यादा दुष्परिणाम अगर कोई सहता है तो वो आपकी माँ ही होती है क्योंकि कमजोर होते संसारिक रिश्तों मे केवल माँ ही ऐसी होती है जो निराशा के भंवर मे फंसी अपनी सन्तान को सब तरफ से दिलासा देती है ओर दिन रात सोते जागते वो सन्तान की खुशी के लिये भगवान से प्रार्थना करती है। इसीलिये सच भी है कि जिसने धरा पर माँ को जान लिया उसने भगवान को पहचान लिया। चार लाईन मे मैं अपनी बात समाप्त करूंगा
माँ से ही जना ये संसार है
माँ शक्ति सामर्थ्य का मूर्त साकार है
माँ तेरे ही चरणों मे तीरथ सारे पकार है
निराकार ब्रम्ह की तू मूरत आकार है
तीनों लोकों से भी बढ़कर माँ तेरा प्यार है।
धन्यवाद।
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र












