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मैं कौन हूं

‘मैं कौन हूॅं ‘ एक अहम रहा सवाल।
ढूॅंढ चुकी इसका जवाब मिला नहीं हल।
अपने अस्तित्व पर लगी रही हर पल साख।
सृष्टिहूॅं, प्रकृति हूॅं , नारी हूॅं ,जीवन की राख।

जीव -जगत की जीवंत प्राणी रूप।
कन्या से नारी,नारी से प्रौढ़ा प्रतिरूप।
रूप, रंग,चाल- ढाल ,व्यवहार में अंतर।
उठता मन में ‘मैं कौन हूॅं’ का ही मंतर।

लड़ती रही उम्र से संग रहा केवल वक्त।
जान न पाई अपने को वक्त तेजी से गुजर रहा।
कौन अपना, कौन पराया,किसकी आन,मान।
हजार कोशिशें करती रही,बना न सकी पहचान।


डॉ सुमन मेहरोत्रा,
मुजफ्फरपुर, बिहार

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