
माँ, तू कैसे जान जाती है
मैं क्या कर रही हूँ हर पल,
मेरे हर कदम की आहट को
कैसे पहचान लेती है सरल?
शायद तुझे मैं पहचान न सकी,
तेरे मन को समझ न सकी,
पर आज जब खुद माँ बनी हूँ,
तब तेरी ममता समझ सकी।
मेरा यूँ गिरना, संभल जाना,
दौड़ते-भागते डर लगना,
बिना कहे ही सब कुछ तुझे
कैसे पहले से ही है पता?
मुझे देखते ही तू कह देती
“फिर गिर गई न तू कहीं?”
मैं चुप होकर सोचती रहती,
कैसे तुझे सब पता चल जाता है, माँ।
कैसे सुलाया करती थी तू,
ये याद मुझे आता नहीं,
पर आज जब बच्चे को थामती हूँ,
तेरा ख्याल जाता नहीं।
शायद ऐसे ही थपकी देकर
तूने मुझको सुलाया होगा,
तेरी गोद के उस झूले में
मैंने सपना सजाया होगा।
आज अपने बच्चों में खुद को,
और खुद में तुझे पाती हूँ,
माँ, तू शब्द नहीं कोई
जिसे शब्दों में मैं बाँध पाती हूँ।
तेरी छाया में मेरी दुनिया
आज भी उतनी ही प्यारी है,
तेरी गोद का झूला, हाथ की थपकी
मेरी सबसे हसीन दुनिया है।
रंजीता भारती श्री
सीतामढ़ी,बिहार












