
माँ जिसकी बराबरी कोई
कर नहीं सकता
उसकी जगह को कोई
कभी भर नहीं सकता
वह इस दुनिया की
अद्भुत कृति है
उसके मन में नहीं
कोई विकृति है
जब तक जीतीं है
संतान के लिए
अनन्त स्वप्न सींती है
उसके पास पवित्र
दुआ का भण्डार होता है
संतान के सुख से ही
उस का सुखद संसार होता है
माँ में दिव्यता न्यारी है
संतान को पालने की उसकी
मूलभूत जिम्मेदारी है
सारी खुशियाँ संतान
पर वारी हैं
वह संतान के लिए
अनेकों रात जगती है
व्रत उपवास रखती है
प्रभु वन्दना में अपनी
उम्र भी उसके नाम करती है
खुद भूखे रहकर संतान को
भर पेट भोजन कराती है
तभी तो वह देवी तुल्य
माँ बन पाती है
माँ में प्रभु ने निस्वार्थ भाव
अथाह भरा है
अनेकों माँओं ने संतान
के लिए इतिहास रचा है
हर माँ में मुझे तो
माँ दुर्गा लक्ष्मी और
सरस्वती के अतुलनीय
गुण नज़र आते हैं
तभी तो माँ के सही
स्वरूप का
वर्णन करने में स्वयं को
असमर्थ पाते हैं
शीलू जौहरी भरूच गुजरात स्वरचित मौलिक रचना












