
काम्पिटिशन अब बहुत बढ़ गया,
वेकेन्सियां कम आती हैं।
मेहनत करने के बाद भी,
असफलता मिल जाती है।
नकारात्मकता जन्म है लेती,
उम्र भी हमें डराती है।
माता पिता करके मेहनत,
बच्चों की फीस चुकाते हैं।
बच्चे भी करते हैं मेहनत,
रातों की नींद गवांते हैं।
नहीं डरते वे असफलता से,
बिना रुके बढ़ते जाते हैं।
लड़ते रहते विषम परिस्थितियों से,
जीवन सफल बनाते हैं।
जीवन को सफ़ल बनाकर वे,
नई दिशा दे जाते हैं।
इसके विपरीत………………..
जब बच्चा मेहनत कर संघर्ष झेलता,
फिर भी विफल हो जाता है।
जिससे उसके जीवन की,
दशा बदल जाती है।
साथी की सफलता देख ,
असफलता उसे डराती है।
विश्वास टूटता स्वयं के ऊपर,
हीन भावना आ जाती है।
माता पिता की मेहनत का पैसा,
और सपना उनकी आँखों का।
दुनिया का सामना करने से डरता,
जिंदगी उसकी हार जाती है।
कैसे माता पिता को चेहरा दिखाऊ,
जीवन की समाप्ति होती है।
काम्पिटिशन बहुत बढ़ गया है,
वेकेंसियां कम आती हैं।
अब क्या करें…………………….
बच्चों को अपने समझाएं, बहुत सहा है तुमने कष्ट।
जीवन एक बार मिलता है, नहीं करो तुम इसको नष्ट।
शायद तुमने नहीं सुना है, डर के आगे जीत है।
हार गए एक क्षेत्र में तो क्या, बहुत बड़ा अपना दिल है।
बाहर निकलो लोगों को देखो,
करते हैं सभी जीवन यापन।
कदम तुम अपने डगमगाओ नहीं,
बाज़ुओं में तुम्हारे बहुत है बल।
मिलजुलकर हम साथ चलेंगे,
चाहे बहार हो या हो पतझड़।
मौसम फिर एक दिन बदलेगा,
फूल खिलेंगे अपने भी गुलशन।
रचनाकार – श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)












