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जननी (मां)

तुम हो स्वर्ग से बढ़कर जननी,
तुम्हारे समान माँ कोई न अपनी

तेरी सूरत, तेरी सीरत,
हर देवी की लगती मूरत।
जग की बातें झूठी-सच्ची,
तेरी ममता सबसे पवित्र।
सबकी भिन्न है कथनी-करनी,
तेरा प्यार अमर है जननी।

तुम हो स्वर्ग से बढ़कर जननी,
तुम्हारे समान माँ कोई न अपनी

मेरे उद्गम का स्रोत तुम्हीं हो,
तुमसे ही संस्कार मिला।
सच, सेवा और प्रेम पथ का,
तेरे चरणों से ज्ञान मिला।
तुम कहाँ चली गई हो माता,
कहाँ ढूँढूँ तुझे मैं जननी।

तुम हो स्वर्ग से बढ़कर जननी,
तुम्हारे समान माँ कोई न अपनी

तेरे कारण दुनिया देखी मैंने,
सूरज, चाँद, सितारे देखे।
तेरी गोदी में सिर रखकर,
जीवन के हर सहारे देखे।
शब्द नहीं तेरी महिमा के,
क्या-क्या बखान करूँ मैं जननी।

तुम हो स्वर्ग से बढ़कर जननी,
तुम्हारे समान माँ कोई न अपनी

जब भी मन यह टूटे मेरा,
तेरी यादें संभाल है लेती।
सूनी राहों के अंधियारे में,
माँ, तेरी ममता दीपक बनती।
तुम हो ईश्वर का वह रूप,
जिसमें बसती हर करुणा धनी।

तुम हो स्वर्ग से बढ़कर जननी,
तुम्हारे समान माँ कोई न अपनी

तुझे कल्पवृक्ष कहूँ या कल्पतरु,
हर इच्छा तुमसे ही पाऊँ।
तेरे आँचल की उस छाया में,
जीवन का हर सुख मैं पाऊँ।
पिता हमारे शम्भू बाबू,
माँ मेरी दुर्गेशनंदनी।

तुम हो स्वर्ग से बढ़कर जननी,
तुम्हारे समान माँ कोई न अपनी


रवि भूषण वर्मा

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