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प्रतिक्षा में

खिड़की की ओट से झांकती ,
थकी हुई सी व्याकुल नजरें …
सूने दरवाजे को टकटकी ,
लगाकर देखती बोझिल पलकें ….

अब तो पर्दे की हलचल भी छेड़ती है
दालान पर लगी कुर्सी भी पूछतीं है
कब तक रहेगा मेरा खालीपन ,
आ जाओ अब तो बोझिल हुआ है मन …

झरे हुए पत्तों की खड़खड़ से भी
मन विचलित सा होता है …..
शायद आये हो तुम ……
मन भ्रमित सा होता है ।

पहुंच गया सूरज भी, दूर क्षितिज पर
मिटाने को अपनी थकन….
दिन चढ़ा पग पग , पर डूबा मेरा मन
अब तो घर की पगडंडी को भी ,
घेरता है अकेलापन …..

अब तो आ जाओ , कि आंगन में
भी बढ़ आया है सूनापन …….।।

उर्मिला ढौंडियाल ‘उर्मि’
‌ देहरादून (उत्तराखंड)

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