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बाबा अंबेदकर

विधा : पद्य

कह रहे बाबा अंबेदकर ,
आपस में नहीं भेद कर ।
माॅं भारती के हो बेटे तुम ,
खाए थाली न छेद कर ।।
अंबे को मान या बेद कर ,
देख निज को कुरेद कर ।
ऊॅंच नीच तू सब भूला दे ,
हीनता से परहेज कर ।।
भारत और भारतीय है तू ,
भारत माॅ का आत्मीय है ।
तुम्हीं राष्ट्र राष्ट्र के रक्षक ,
तुम्हीं विश्व ज्ञान दिए है ।।
त्याग दो दिल से युद्ध को ,
याद कर गौतम बुद्ध को ।
बढ़ते रहो कदम मिलाकर ,
कदम नहीं अवरूद्ध कर ।।
सबको ले लो निज संग में ,
दिल को बदल तू गंग में ।
रंग लो ऐसे मन को तू भी ,
जन जन रंग जाए रंग में ।।
मन को करना मनहूस नहीं ,
कोई बुरा करे महसूस नहीं ।
आदर सत्कार नहीं भूलना ,
बनना तुम मक्खीचूस नहीं ।।

अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।

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