Uncategorized
Trending

भावनात्मकता का क्षय

मानव जीवन में तीव्रगति से भावनात्मकता हुआ क्षय।
बौद्धिक संघर्ष में हर मानव डूब गया एक अज्ञात भय।
युवा में भाव साकारात्मकता नहीं रही,कहां हुई है क्षय।
सामाजिक समरसता के मूल्य आज निरंतर गए हैं ढह।

परिवारों में निकटता का विघटन,त्रस्त आज जन-जन।
सुख कर देते थे उत्सर्ग परिजन के सच्चे थे मन दर्पण।
स्वार्थ नहीं,हर जन के तन-मन से सांझे भाव थे अर्पण।
ये थे मूल,मूल्यों की खातिर जन-जन था जीवन दर्शन।

देश मेरे में बजते थे ढोल नगाड़े सच्चे थे मन के भाव।
‘अतिथि देवो भव’समरसता से सरसाते थे गांव-गांव।
सगे संबंधी भी हुए पराए अब कहां मिलेगी ठंडी छांव।
स्वार्थ ने मन को घेरा, कैसे डूबो दें स्वजन की नाव।

विश्व में मची आपाधापी,दूर हुई मानवता, लगे हैं दाव।
कोई जिये मरे,मेरी नीति चले दूजा खाए घाव ही घाव।
भाव विह्वल अब जग सारा, धरा जले नाश के अलाव।
क्या ख़त्म हुई मानवता,अब सांसे चल रही बिन भाव।

                                      महेश शर्मा, करनाल

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *