
साधुचरित सु भ चरित् कपासू।
निरस विसद गुनमय फल जासू।।
जो सही दुख परछि द्र दुरावा।
वंदनीय जेही जग यस पावा।।
बंदउं संत समान चित्,
हित अनहित नहीं कोई।
अंजुलि गत शुभ सुमन जिमि,
सम सुगंध कर दोइ।।
साधु, संत का जीवन कपास के समान शुभमंगल मय होता है,
जिसका फल निरस विसद
गुणमय होता है।
संत सरल चित् जगत हित,
जानि सुभाउ सनेहू।
बाल विनय सुनी करी कृपा,
रामचरण रति देहु।।
साधु के जीवन मे विषय वासना नही होने से निरस है। संत का चरित्र सद्गुणों से परिपूर्ण होता है।
साधु पुरुष भी परोपकार के लिए स्वयं कष्ट सहकर संसार का कल्याण करते हैं। इसीलिए संत चरित संसार में यश प्राप्त करके वंदनीय होता है।
मैं संतो को प्रणाम करता हूं जिनके चित् में समता है, जिनका ना कोई मित्र है ना कोई शत्रु। जैसे अंजुलि में रखे हुए सुंदर पुष्प, जिन हाथो ने उनको तोड़ा और जिन्होंने उनको रखा, दोनों ही, हाथों को सुगंध से सुगंधित करते हैं, इसी तरह संत पुरुष मित्रों और शत्रुओं दोनों का समान रूप से कल्याण करते हैं।
संत सरल हृदय और जगत के हितकारी होते हैं, उनके ऐसे स्वभाव और स्नेह को जान कर में विनय करता हूं किसको सुनकर वे कृपा करके श्री राम जी अपने चरणों में मुझे प्रीति दें।
राजेंद्र कुमार तिवारी मंदसौर ,मध्य प्रदेश












