
डूबते को तिनके का सहारा जैसे,
किसी समंदर का किनारा जैसे।
मेरी नाव का वो दरिया जैसे,
मेरी बातें बयां करने का जरिया जैसे।
बंजर ज़मीन को बारिश जैसे,
दिल में रहती कोई ख़्वाहिश जैसे।
हीरे को जौहरी की आज़माइश जैसे,
उस ऊपरवाले से मिली नवाज़िश जैसे।
सर्द दिनों की कोई शाम जैसे,
मन को मिलता आराम जैसे।
लंबी रात के बाद सवेरा जैसे,
ख़्वाबों में दिखता कोई चेहरा जैसे।
रूह को छूती कोई सरगम जैसे,
ज़ख्म पर लगा मरहम जैसे।
पत्ते पर ओस की बूंद जैसे,
मन में गूंजती कोई धुन जैसे।
कड़कती धूप में छाँव जैसे,
सादगी भरा कोई गाँव जैसे।
पूरी होती कोई कहानी जैसे,
किसी की आख़िरी निशानी जैसे।
मेघा दास
सरायपाली महासमुन्द छ.ग












