
भगवान श्री राम का अयोध्या वासियों को उपदेश,,,,,,
एक बार रघुनाथ बोलाए।,
गुरु , द्विज, पुरवासी सब आए।।
बैठे गुरु, मुनि,अरू द्विज सज्जन।
बोले वचन भगत भवभंजन।।
सुन हूं सकल पुरजन मम बानी।
कहउं न कछु ममता उर आनी।।
नहीं अनीति नहीं कछु प्रभु ताई।
सुन हूं, कर हूं, जो तुम ही सो हाई।।
सोई सेवक प्रियतम मम सोई।
मम अनुसासन माने जोई।।
जो अनीति कछु भाषोंभाई।
तों मोहि बरजहु भय बिसराई।।
बड़े भाग मानुस तनु पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथनेही गावा।।
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा।
पाई न जेहिं परलोक संवारा।।
सो परत्र दुख पावइ, सिर
धुनि धुनि पछिताइ ।
कालहि कर्म हि ईश्वरहि,
मिथ्या दोष लगाइ।।
एहि तन कर फल विषय न भाई।
स्वर्गउ स्वलप अंत दुखदाई।।
नर तन पाई विषय मनदेही
पलटि सुधा ते सठ विष लेही।।
ताही क बहू भल कहई न कोई।
गुंजा ग्रहई पर स मनि खोई।।
आकर चारि लाक्ष्य चोरासी।
जोनि भृमत यह जीव अविनाशी।।
फिर त सदा माया कर प्रेरा।
काल कर्म सुभाव गुन घेरा।।
कब हूं कि करि करुना नरी देही।
देत ईस बिनु हेतु सनेही।।
नर तनु भव बारिधि कहुं बेरो।
सनमुख मरूत अनुग्रह मेरो।।
करनधार सदगुरु दृढ नावा,।
दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।।
जो न तरै भवसागर नर समाजअस पाइ।
सो कृत निंदक मंदमति,
आत्माहन गति जाइ।।
जो परलोक इहा सुख चहहू।
सुनि मम बचन हृदयॅ दृढ
गहहू।।
सुलभ सुखद मारग यह
भाई।
भगति मोरि पुरान शरूति गाई।।
ग्यान अगम युह












