
नहीं है मेरी मनोकामना हे हरि,
अथाह धनअर्जन का भाव रखूँ।
वैभवशाली होकर इस धरती पर,
मद मस्त मदन बन कार्य करूँ।
हे दाता मुझको बस इतना देना,
अपनों का प्रतिदिन पेट भर सकूँ,
उनके जीवन का आश्रय बन कर,
उनकी पीड़ा और उनके कष्ट हरूँ।
बलवान बनूँ या नहीं प्रभू मैं,
निर्बल का शोषण नहीं करूँ,
हे हरि दुष्टों से भी मैं नहीं डरूँ,
अहंकार, लोभ प्रतिकार करूँ।
सदा सत्यम शिवम् सुंदरम् सा,
मैं नहीं किसी पर क्रोध करूँ,
उन्नति देख दूसरों की मैं कभी
न कोई ईष्या द्वेष का भाव रखूँ।
राजनीति के दूषित पथ से दूर रहूँ,
सत्ता के सुख का प्रतिकार करूँ,
आदित्य राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रसेवा में शेष
जीवन अर्पण करने से भी नहीं डरूँ।
डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ













