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बाँसुरी: सांसों का संगीत, मौन की भाषा


डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक

बाँसुरी सिर्फ बांस का एक टुकड़ा नहीं। वो सात सुरों में बंधी एक पूरी कायनात है। कृष्ण के होंठों से लगकर वो प्रेम का पर्याय बनी, तो मीरा के लिए विरह की साखी। एक छेद से अंदर जाती सांस, सात छेदों से होकर जब दुनिया में गूंजती है, तो लगता है जैसे ब्रह्मांड खुद राग छेड़ रहा हो।

इतिहास के पन्नों से
सिंधु घाटी की खुदाई में मिली हड्डी की बाँसुरी बताती है कि ये साज 4000 साल पुराना है। नाट्यशास्त्र में भरत मुनि ने इसे “वंशी” कहा। अमीर खुसरो ने इसे सूफी संगीत का हिस्सा बनाया। और पन्नालाल घोष ने बांसुरी को शास्त्रीय मंच पर वो इज़्ज़त दिलाई कि आज हर राग उसमें सांस लेता है। हरिवंश रॉय बच्चन ने ठीक ही लिखा था: “बांसुरी के स्वर में जो जादू है, वो किसी तर्क से परे है।”

  • ये साज?*
  1. सादगी में बादशाहत: न तार, न चमड़ा, न धातु। खोखला बांस और उंगलियों का जादू। जितना सरल ढांचा, उतनी गहरी अभिव्यक्ति।
  2. सांस का सीधा रिश्ता: तबला थाप मांगता है, सितार मिज़राब। पर बाँसुरी सिर्फ आपकी सांस मांगती है। आपकी धड़कन, आपका दर्द, आपकी खुशी सीधे सुर बन जाते हैं। इसलिए इसे सबसे “ईमानदार” वाद्य कहते हैं।
  3. हर रस की चेरी: भैरवी में रुला दे, मालकौंस में डरा दे, पहाड़ी में पहाड़ों की सैर करा दे और भूपाली में भोर का एहसास दिला दे। एक ही बाँसुरी से श्रृंगार, करुणा, शांत सब रस बहते हैं।

बनाने का विज्ञान, बजाने की साधना
अच्छी बाँसुरी असम या केरल के खास बांस से बनती है। गांठों के बीच की दूरी, बांस की मोटाई, छेदों का गणित: सब कुछ रियाज़ की तरह सधा हुआ। $f = \frac{v}{2L}$ का फिजिक्स यहां भक्ति बन जाता है। पर असली खेल शुरू होता है जब फूंक मारते हो।

“फूंक” में ही प्राण हैं। बहुत तेज़ हुई तो सुर चीखेगा, धीमी हुई तो रिरियाएगा। इसीलिए कहते हैं बाँसुरी बजाना प्राणायाम है। पंडित हरिप्रसाद चौरसिया साहब मानते थे कि आलाप वो प्रार्थना है जो शब्दों के बिना की जाए।

बाँसुरी और ज़िंदगी
ध्यान से देखो तो बाँसुरी ज़िंदगी का सबक है। अंदर से खोखले हो जाओ, तभी ईश्वर तुमसे अपना गीत गवा पाएगा। जितने ज्यादा छेद यानी घाव, उतने ज्यादा सुरों की संभावना। गांठें आएंगी, पर उनके बीच का खाली हिस्सा ही संगीत पैदा करता है।

कृष्ण की बाँसुरी की तीन खास बातें थीं: एक, वो चुनिंदा लोगों को ही सुनाई देती थी। दो, उसे सुनकर यमुना उल्टी बहने लगती थी। तीन, वो बजाने वाले से ज्यादा सुनने वाले को बदल देती थी। आज भी अच्छी बाँसुरी वही है जो बजाने वाले का नहीं, सुनने वाले का मन बदल दे।

*आज *
पंडित रोनू मजूमदार ने इसे फ्यूज़न में उतारा, राकेश चौरसिया ने फिल्मों में अमर किया। “मोहे रंग दो लाल” से लेकर इंटरस्टेलर के थीम तक, बाँसुरी हर जगह फिट है। यू-ट्यूब पर 10 मिनट का बाँसुरी मेडिटेशन मिलियन व्यूज़ पार कर जाता है। क्यों? क्योंकि शोर के इस दौर में बाँसुरी वो सुकून है जो डेटा पैक से नहीं खरीदा जाता।

शब्दों में समेटें तो*
बाँसुरी तकनीक नहीं, तपस्या है। वो पहला साज है जो बच्चे की सांस से बजता है और आखिरी साज है जो मरघट पर भी वैराग्य पैदा करता है। इसके लिए लकड़ी नहीं, लय चाहिए। रीड नहीं, रूह चाहिए।

अगर कभी मौका मिले, किसी बाँसुरी वादक की आंखें देखना जब वो आलाप लेता है। पलकें बंद, दुनिया से बेखबर। उस पल वो बांस नहीं बजा रहा होता, खुद बज रहा होता है। और शायद इसीलिए गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था: “भगवान ने जब इंसान को दुख दिया, तो उसके आंसू पोंछने के लिए बाँसुरी का स्वर भी दिया।”

तो अगली बार जब कहीं से बाँसुरी की तान कानों में पड़े, रुक जाना। वो सिर्फ हवा नहीं होती। वो किसी की सदियों की साधना होती है, जो तुम्हारी रूह के किसी बंद दरवाज़े को खटखटाती है।

कहते हैं, पूरी बनी-बनाई बाँसुरी बाज़ार में मिल जाती है। पर जो सुर दिल में उतर जाए, वो वाला साज़ तो रियाज़ से ही मिलता है।

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