
जिस ग़ज़ल ने मुझे, सिखाया है इश्क,
उस ग़ज़ल को ग़ज़ल सुनाऊँ क्या।
जिसकी अल्फ़ाज ने, बहकाया है मेरा दिल,
उस गजल को हाले दिल बताऊँ क्या।
जिसकी यादों से रंगीन, हो जाती है शामें,
दीप नयनों से अब जलाऊँ क्या।
जिसने ख्वाबों में, हँसना सिखाया मुझे,
वो ही बसती है ख़्वाब में उसे बताऊँ क्या।
वो ही मंज़िल है, वो ही है दुनिया मेरी,
उससे दूरी का दर्द सुनाऊँ क्या।
जिस ग़ज़ल ने मुझे, सिखाया है इश्क,
उस ग़ज़ल को ग़ज़ल सुनाऊँ क्या।
रवि भूषण वर्मा













