
धरती सूरज चांद सितारे,
व्योम के ये तारे गण न्यारे!
करते नित बंदन मिलकर के,
लगते हैं कितने ये प्यारे!!
हे परमपिता हे परमेश्वर,
हे दिनबंधु दुख हर्ता!
सुख के सागर, सब गुण आगर,
हे जग के कर्ता धर्ता!!
स्वच्छ सालोना जग उपवन सा,
हो जाए प्रभु, ऐसी आशा!
रहे न कोई भूखा प्यासा,
पूरी हो सबकी अभिलाषा!!
‘जिज्ञासु’ जन गण मन हे प्रभु,
ईर्ष्या द्वेष रहित हो!
प्रेम स्नेह सद्भभाव से जग का,
हर कण-कण सिंचित हो!!
कमलेश विष्णु सिंह ‘जिज्ञासु’













