
सूरज की किरणें आग उगलती,
अपना रौद्र रूप दिखलाती।
तपती धरती विचलित हर प्राणी,
तन और मन को हैं झुलसाती।
जंगल थे धरती के रक्षक,
तपन से उसे बचाते थे।
गर्मी के उष्ण थपेड़े भी,
ठंडी बयार बन जाते थे।
जब काट दिये गये जंगल,
धरती रक्षक विहीन हुई।
ग्रीष्म ऋतु में तपन धरती की,
धीरे धीरे विकराल हुई।
हरियाली की ओढ़ के चादर,
धरती खुद को बचाती है।
कंक्रीटों के इस दौर में धरती
गर्मी से कहां बच पाती है।
तपती धरती की पीड़ा का,
अंजाम बहुत भारी होगा।
सूखेंगे जल के स्त्रोत ,
भूमिगत जल भी खत्म हो जायेगा।
अब भी अगर हम चेते नहीं ,
धरती की सहनशीलता खत्म हो जाएगी।
तपती धरती एक दिन फिर से,
आग का गोला बन जाएगी।
डॉ. दीप्ति खरे ,
मंडला(मध्य प्रदेश)













