
वक्त का एक जबरदस्त कहर है
जिल्लत का कडवा जहर है
जीना है तो पीना ही पड़ेगा
ये दंश भी अब सहना पड़ेगा
वक्त का सितम है
साथ सिर्फ गम है
गिले नही किसी से खफा सारी दुनियाँ है
चाहा नहीं कुछ किसी से रिश्तों मे फिर भी दूरियाँ है
अपने ही अपनो से भाग रहे है
दिन रात एक अनहोनी मे जाग रहे है
घर की चार दीवारी अब बेजान हो गयी
क्या कहे कि जिंदगी दूसरों की मेहरबान हो गयी
इतना जले कि राख हो गये
एतबार करके बरबाद हो गये
नफरतों से मन अब ज़हर हो गया
प्रेम की आस मे खंडहर सारा शहर हो गया
वीरान उजड़ी दुनियाँ मे इंसान ही जानवर हो गया
निगलने को बेताब एक दूजे को बदस्तूर हो गया
गैरीयत अब दुनियाँ मे रहने का ईमान हो गया
भरोसा अब किस्से कहानियों की पहचान रह गया
खुदगर्ज़ी के आगे इंसान बेबस हो गया
हर रिश्तों पर भारी उसका सुकून हो गया
फ़र्ज़ ईमान सब सरे बाजार कौड़ियों मे बिक गये
बड़े दिलवालों के दिल अब छोटे हो गये
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र













