
गुजर रही है उम्र, पर जीना अभी बाकी है।
जिन हालातों ने पटका है ज़मीन पर,
उन्हें उठाकर जवाब देना अभी बाकी है।
चल रहा हूँ मंज़िल के सफर में,
मंज़िल को पाना अभी बाकी है।
कर लेने दो लोगों को चर्चे मेरी हार के,
कामयाबी का शोर मचाना अभी बाकी है।
वक्त को करने दो अपनी मनमानी,
मेरा वक्त आना अभी बाकी है।
कर रहे हैं सवाल मुझे जो लूज़र समझ कर,
उन सबको जवाब देना अभी बाकी है।
निभा रहा हूँ अपना किरदार ज़िन्दगी के मंच पर,
परदा गिरते ही तालियाँ बजना अभी बाकी हैं।
कुछ नहीं गया हाथ से अभी तो,
अमन बहुत कुछ पाना अभी बाकी है।
गिरा हूँ तो क्या, संभलना आता है मुझे,
ठोकरें खाकर भी चलना आता है मुझे।
अँधेरा कितना भी घना हो रात का,
सुबह तक मुस्कुराकर जलना आता है मुझे।
लोग कहते हैं “तेरा टाइम नहीं आएगा”,
मैं कहता हूँ “टाइम अपना बनाना आता है मुझे”।
खामोश हूँ तो ये मत समझना कि हार मान ली,
शोर से ज्यादा तूफान दबाना आता है मुझे।
राख से उठूंगा मैं, फीनिक्स की तरह,
जो जला नहीं पाए वो कहानी लिखूंगा।
जिन आँखों ने मुझे गिरता देखा है,
उन्हीं आँखों से खुद को उठता दिखाऊंगा।
अभी तो बस शुरुआत है, असली खेल बाकी है,
जिन्हें लगता है मैं खत्म, उन्हें समझाना बाकी है।
गुजर रही है उम्र, पर जीना अभी बाकी है,
इस दुनिया को अपना होना बताना अभी बाकी है।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













