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टूटते रिश्ते, बिखरते परिवार

गंभीर चिंतन

— ओमपाल सिंह

घर तो आज भी खड़े हैं, दीवारें भी वैसी ही हैं, पर न जाने क्यों आँगन की धूप अब पहले जैसी नहीं लगती।

एक समय था, जब एक रोटी चार हिस्सों में बँट जाती थी, और चार लोग एक-दूसरे के दुःख बाँट लेते थे। आज थालियाँ बड़ी हो गई हैं, पर दिल छोटे पड़ गए हैं।

रिश्ते अब निभाए नहीं जाते, सिर्फ़ गिने जाते हैं। अपनेपन की गर्माहट मोबाइल की स्क्रीन में कहीं खो गई है। बातें होती हैं, मगर संवाद नहीं होते।

बुज़ुर्गों की आँखों में अब भी इंतज़ार पलता है, कि कोई पास बैठकर दो घड़ी हाल पूछ ले। पर नई पीढ़ी के पास समय तो है दुनिया के लिए, बस अपनों के लिए नहीं।

अहंकार ने प्रेम को हराया, स्वार्थ ने संस्कारों को। और धीरे-धीरे एक छत के नीचे रहने वाले लोग अलग-अलग संसारों में बस गए।

टूटते रिश्तों की आवाज़ कभी सुनाई नहीं देती, पर उसकी गूँज पीढ़ियों तक सुनाई देती है। जब बच्चे सीखते हैं कि नाराज़ होकर दूर चला जाना आसान है, पर झुककर रिश्ता बचाना कठिन।

परिवार केवल रक्त का संबंध नहीं, त्याग, विश्वास और धैर्य का नाम है। जहाँ “मैं” छोटा हो जाए और “हम” बड़ा हो जाए, वहीं परिवार जीवित रहता है।

याद रखिए, धन से मकान खरीदे जा सकते हैं, पर घर नहीं। सुविधाएँ खरीदी जा सकती हैं, पर अपनापन नहीं। और जिस दिन यह बात समझ में आ जाए, उसी दिन टूटते रिश्तों को फिर से जोड़ा जा सकता है।

आइए, थोड़ा झुकें, थोड़ा सुनें, थोड़ा समझें, क्योंकि रिश्ते जीतने से नहीं, निभाने से बचते हैं।

ओमपाल सिंह
“परिवार की सबसे बड़ी पूँजी धन नहीं, एक-दूसरे का विश्वास होता है।”

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