
चारों ओर विराजित जग में,
सत्य सनातन रमा हुआ है।
रोम-रोम, कण-कण में छाया,
ग्रह, नक्षत्र, तारों को छुआ है।
दशों दिशा में ज्योति निराली,
साहित्यिक सचेतना प्यारी।
शीतल, मन्द, सुगन्धित, सुरभित,
भरती है रुचि सबमें भारी।।
इसी सनातन धर्म, सत्य ने,
हमको आज छुआ है।
इसीलिए तो गुरु के संग चल,
खोदा आज कुंआ है।।
जिसमें निकली धार सरस व,
निर्मल, शीतल, सुखकर।
तृप्तिदायिनी, बिखरी भूतल,
सब उर आज बरसकर।।
यही सत्य है जिसमें जग का,
गौरव सकल समाया।
इसी सत्य ने महापुरुषों संग,
चलकर है यश पाया।।
राम-कृष्ण, तुलसी, कबीर ने,
यश जिसका है गाया।
मीरा, नानक, चैतन्य प्रभु ने,
सदा हृदय में पाया।।
सबरी और अहिल्याबाई,
और ओरछा की रानी।
जिनने कीरति गायी जग में,
राम-राम कहकर दानी।।
वैभव सकल विश्व में पाया,
इसी सत्य के बल पर आज।
वही रमा है प्रकृति और ब्रम्हाण्ड,
सकल में करता राज।।
सत्य सभी का, नहीं किसी का,
सबमें सदा रमा है यह।
सबका इससे जन्म-जन्म का,
है नाता, महिमा नित कह।।
इसी सत्य के बल पर धरती,
है आकाश थमे नक्षत्र।
तारे, ग्रह, सागर, पर्वत, नर,
नारी, पशु-पक्षी सर्वत्र।।
इसी सत्य से डरते हैं सब,
करते हैं शुभ कर्म विमल।
जन्म-भूमि ये कर्मक्षेत्र है,
यहाँ मिले करमों का फल।।
सत्य सीख देता है सुन्दर,
उपयोगी, उद्योगी बन।
जानो खुद को ध्यान, योग से,
परिश्रमी हो, होंय सुवन।।
सत् में सभी समाया है,
ब्रम्हाण्ड चराचर छाया है।
जो अदृश्य, निर्लिप्त है निर्गुण,
निराकार जिन पाया है।।
शक्तिमान, व्यापक, अविकारी,
अकल, अनीह, विरज, विभु भारी।
सदा अचिंचित, है सदोष वह,
दोषरहित महिमा जग न्यारी।।
वेद-पुराण, उपनिषद गायी,
महिमा, यश वेदांत बखाना।
रामायण, श्यामायण, ज्योतिष,
ऋषि-मुनियों ने इसको जाना।।
सप्तद्वार से सत् प्रवेश के,
मार्ग सप्त तन माहिं कहे।
भैरव तन्त्र व विजय मालिनी,
में, विधि ध्यान कीं, सदा लहे।।
शिवपुराण में कालजयी हैं,
चार साधना साधक हित।
शिव ने पार्वती, रावण को,
कहीं, सकल हैं वहाँ विहित।।
अहंकार हो अगर हृदय में,
सत्य कभी न पाओगे।
चाहे हो ब्रम्हाण्ड, प्रकृति,
वश में, नीचे गिर जाओगे।।
धैर्य, नम्रता, छमाशीलता,
होने का अभिमान नहीं।
कर्ताभाव न हो जिसके मन,
वैर-विकार न हों उरहीं।।
समता है जिसके उर छायी,
सबको समझे एक समान।
ऊँच-नीच का भाव नहीं है,
वह करता सबका कल्याण।।
वही सत्य का अधिकारी है,
वही सत्य को पाता है।
वही अलौकिक, पूर्णकाम हो,
जग में सुयश कमाता है।।
वही अमर होता है जग में,
देव, दनुज, किन्नर, गन्धर्व।
ऋषि-मुनियों में पूजा जाता,
सिद्ध वही ईश्वर पर गर्व।।
रचनाकार-
पं० जुगल किशोर त्रिपाठी (साहित्यकार)
बम्हौरी, मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)











