
आज अपना अस्तित्व मिटाने के लिए नहीं, अपने पास कोई स्थान,
अपने गांव की धरती की धूमिल होती पहचान।
आखिर कब तक साथ देगा तुम्हें चंबल का किनारा,
अपने गांव का स्वाभिमान तो पहले से ही हारा।
इंसान के मरने के बाद भी नहीं मिलता भुतेश्वर महादेव का सहारा,
आखिर कब बनेगा अपने गांव में मुक्तिधाम।
अंतिम श्रद्धांजलि में भी नहीं बोल सकते हैं हे राम,
यह अपने गांव वालों की कायरता का है परिणाम।
अब मुक्तिधाम मांग रहा है बलिदान,
अपने गांव की एक अलग ही होगी पहचान।
या फिर कायरता की चादर ओढ़ कर सो जाओ,
अपनी आने वाली पीढ़ी को त्याग बलिदान के सपने मत दिखलाओ।
और क्या लिखूं मैं खड़ावदा की बेबसी की कहानी,
आने वाले समय में डूबकर मरने के लिए भी नहीं मिलेगा चुल्लू भर पानी।
कवि – गोपाल जाटव ‘विद्रोही’
खड़ावदा, तह. गरोठ, जिला मन्दसौर, मध्यप्रदेश











