शिव जी के {गले में सर्प} लिंग में नहीं रखें सर्प ।।
द्वादश ज्योतिर्लिंग इसके प्रमाण ।।
‘
।। गतानुगतिकोलोकः ।।
‘ ।। संसार मे लोग देखा-देखी करते हैं ।।
माता पार्वती का शरीर जिसे अरघा कहते हैं,
उस पर शिवलिंग के साथ सर्प रखने वाली परंपरा कैसे शुरू हुई ।।
ध्यान रहे कि, बारहों ज्योतिर्लिंग में माता के जांघों पर केवल शिवजी का लिंग है सर्प नही ।।
आप जानते हैं…………
सर्प अक्सर शांत वातावरण में रहता है, चूहे के बिलों में चूहे खाने के लिए घुसता है, और जहां भी {बिल} मांद पाता है वहीं घुस जाता है ।।
पूजा के बाद भगवान को एकांतवास के लिए मंदिर को बंद कर दिए जाते हैं ।
मंदिर में जल निकासी का मार्ग नाली के माध्यम से सर्प मंदिर मे घुसते है तो, जलधारी होकर शिवलिंग के आसपास पहुंच जाते है, और शिवलिंग का स्पर्श होते ही ठंडाई पाकर स्वाभाविक रूप से शिवलिंग से लिपट जाते हैं ।।
मंदिर के पट {फाटक} खोलते समय, आहट पाकर सर्प अपने स्वाभाविक रूप में लेकर खड़ा हो जाने से , शिवलिंग के ऊपर फन आ जाना स्वभाविक हो जाता है ।
और इससे भक्त लोगों के भीतर अपने ढंग का भाव जागृत होकर, लोग पुण्य पाने के लोभ में, सर्प बनवा करके शिवलिंग पर रखने लगे हैं । जो किसी भी प्रकार से उचित नहीं है ।।
विचार करने योग्य है की माता के जंघों पर, केवल शिवलिंग हो सकता है, किसी भी दूसरे देवी या देवता का शरीर शिवलिंग के साथ रखे जाने का कोई औचित्य नहीं है ।।
लेकिन धनवान लोग जो चाहते हैं वही करते है, सुंदर दिखने के चक्कर में साधना करना भूल गए हैं लोग यदि लोग साधना करते हैं तो भगवान का ओरिजिनल स्वरूप हृदय में दिखाई पड़ता है ।।
और जो नंगी आंखों से दिखता है, कोई भी चीज वह बनावटी ही है ।। मनुष्य का बनाया कोई भी रूप, भगवान का रूप बन पाना सम्भव ही नहीं है । मूर्ति इसलिए बनाई जाती है कि, जिससे हम सभी को प्रेरणा मिले ।।
हमारा दिनचर्या ठीक हो, ईश्वर के प्रति हमारी आस्था रहे हम ईश्वर के अनुशासन में रहें,
इसका मतलब यह नहीं है की माता पार्वती के जांघों पर सर्प रख दें ।।
एक म्यान में दो तलवार कैसे हो सकती है —
कि योनि में सर्प भी रहे और भगवान का लिंग भी रहे ।।
अरे बुद्धमानों कुछ तो सोचो ??
तुम मनुष्य हो पशु नहीं हो ।।
आवश्यकता से अधिक श्रृंगार भी ठीक नहीं होता ।।
मन ना रंगाया रंगाया जोगी कपड़ा
मन को ईश्वर के रंग मे रंगना अच्छा या रंगीन कपड़े से तन को रंगना ।।
भगवान को प्रसन्नता होगी किससे ।।
।। यथा मन एकाग्र मूर्ति पूजा वर्जयेत् ।।
साधक को साधना करने से पहले उसे मंत्रों को बोल-बोलकर पढ़ने के लिए कहा जाता है,
जब साधक मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करना प्रारंभ कर देता है,
तब उसको हल्के आवाज में पढ़ने के लिए कहा जाता है ।
और जब मंत्र विशिष्ट रूप में जपना प्रारंभ हो जाता है साधक का,
तो फिर मन में केवल मानसिक जप करने के लिए कहा जाता है ।
गुरु की आज्ञा यही है ।।
इसी तरह पहले माता-पिता बच्चों को चित्र रखकर की वहां एक अक्षर लिख देते हैं और कमल के फूल के चित्र के बगल में ,
क लिखते हैं बच्चा कमल का फूल देखकर जब आकर्षित होता है और जब क को पहचान लेता है तो कमल का फूल हटा दिया जाता है । ठीक वही व्यवस्था साधक के लिए है,
देवी देवताओं में तीन भाग है ।
एक तो माँ की पूजा होती है माता के शरीर का चित्र बनाकर साकार पूजा के बाद,
एक त्रिभुज के बीच काले विन्दु की माता की सूक्ष्म, शक्तिकी पूजा होती है जिसे शाक्त कहा जाता है ।
भगवान विष्णु की पूजा साकार ब्रह्म की उपासना जो होती है, वह माता लक्ष्मीविष्णुजी की पूजा होती है ।
और जब भगवान विष्णु माता लक्ष्मी हृदय में विराजमान हो जाते हैं ,
उसके बाद शालिग्राम की पूजा प्रारंभ होती है ।
अंतिम में माता पार्वती भगवान शिव की पूजा होती है और जब भगवान शिव माता पार्वती हृदय में उपस्थित हो जाते हैं तो फिर शिवलिंग की पूजा प्रारंभ होती है ।
माता काली का प्रथम रूप गायत्री है गायत्री की उपासना के बाद माता काली की पूजा काले बिंदु रूप में होती है । भगवान विष्णु की शालिग्राम रूप की पूजा भी काले में होती है । भगवान शिव जो कपूर के समान उनका शरीर है, शिवलिंग की पूजा काले रूप में होती है ।।
आपकी साधना भी प्रथम जब आप आंख बंद करके ध्यान करते हैं तो, काले रंग आवरण से ही आच्छादित रहता है हमारा ध्यान पथ ।।
उस काले आवरण में से ही जब ज्योति प्रस्फुटित होता है तो,
परम आत्मा का दर्शन होने का मार्ग प्रशस्त होता है । ऐसे में बंधु आप जब, जप प्रारंभ करते हैं साधना तो सबसे पहले सूत्र है —
अथ योगानुशासनं
प्रभु से जूड़ने के लिए अनुशासन में रहना
उसके बाद आता है—
चित्तवृत्तिनिरोध: इसका अर्थ है कि अपने आंखों में अनेक प्रकार के जो चित्र हैं, वह बनना बंद हो जाए केवल मुझे जो हम ध्यान करें वही केवल दिखाई पड़े ।
प्रकृति ने हमको ऐसी दृष्टि दी है कि हम एक मील दूर की चीज देखना चाहे तो वही दिखाई देगी बीच की चीज अस्पष्ट हो जाएगी ।
ईश्वर चक्षु दिया है इसको खोलें,
ईश्वर के शक्ति की पूजा करें उसकी चित्र बनाकर के पूजा करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता भगवान के तीन रूप हैं
स्थूल , सूक्ष्म , कारण ।
१~ स्थूल का अर्थ है- शरीर की पूजा ।।
२~ सूक्ष्म का अर्थ है- शिवलिंग की पूजा ।।
और……
३~ कारण का अर्थ है- हृदय में ज्योति का प्रकाश, अर्थात् ज्योतिका ध्यान !!
लिंग से ज्योति प्रस्फुटित होने पर, वह ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है ।।
ऐसे में शिवलिंग में सर्प रहेगा तो आप सर्प का ध्यान करोगे की, ज्योतिर्लिंग का ध्यान करोगे ।।
दो चित्र सामने आपके होंगे तो एक पर ध्यान लगाओगे कि, सर्प और लिंग – दोनो पर, ध्यान लगाओगे ।।
चित्त की वृत्तियों का, निरोध करने के लिए ही, रूप अलग कर दिया जाता है ।। इसलिए शिवलिंग लिंग है लिंग के पास दूसरे का आवास नहीं होना चाहिए ।।
वहां केवल शिवलिंग रहेगा और साधक रहेगा । तीसरे की वहां क्या आवश्यकता है ।।
कहीं-कहीं शिवलिंग के चारों ओर शिव परिवार को लोग स्थापित कर देते हैं। वह भी ठीक नहीं है। क्योंकि
माता के शरीर {अरघा} में भगवान के परिवार के कार्तिकेय, अशोक सुंदरी, गणेशजी और स्वयं मां पार्वती {अरघा के रूप} में और भगवान शिव शिवलिंग के रूप में नियत स्थान है ।।
क्रमशः ———-
शिवकृपा ।।
लेखक– पंडित बलराम शरण शुक्ला नवोदय नगर हरिद्वार











