
बात थोड़ी आपकी भाती तो है।
कुछ कवायद सच नज़र आती तो है।
क्या हुआ वो पेड़ जिस पर फल नहीं,
बैठकर कोयल वहाँ गाती तो है।
इस शहर से उस शहर को जोड़ने,
गाँव से होकर सड़क जाती तो है।
चाहतों का हो न हो चाहे असर,
देर मेंहदी रंग दिखलाती तो है।
हो भले ही चाँद बादल में छुपा,
आसमाँ पर रोशनी छाती तो है।
लाख उसको भूलने की सोच लें,
वो अदा फिर सामने आती तो है।
नवीन माथुर पंचोली













