
आज सभी के हाथ में मोबाइल ,स्वतंत्र रहने की चाह ने सभी को व्यावहारिक रूप से खत्म कर दिया है ,लोग मोबाइल के साथ ही रिश्ता महसूस करते है ,इंसान ही इंसान को पसंद नहीं करता आजकल , हर रिश्ता बोझ लगता है । जिस देश में कभी शामें चौपालों में गुज़रती थीं, एक रोटी भी चार लोगों के साथ बैठ कर खाई जाती थी,आज सभी की प्लेट अलग और कमरा अलग है , आज उसी देश में लाखों लोग अपने दर्द के साथ चुपचाप सो जाते हैं।यहां कोई एक दूसरे की सुनने समझने वाला नहीं है ।
गांव से शहर हो गए , मिट्टी के घर से पक्के मकान तक का सफ़र इंसानों को एक बदलाव की ओर ले गया जहां घर तो बड़े हो गए, लेकिन दिलों के बीच की दूरियाँ उससे भी बड़ी हो गईं। पूरा परिवार निज स्वार्थ स्वतंत्रता के साथ टूट गया ।
मोबाइल पर दोस्त तो दिखते है पर यदि असल जीवन में सहायता हो या अकेलापान मिटाने के लिए कुछ समय किसी का साथ मिल पाना अब मुमकिन नहीं ,समय बदल रहा है कोई किसी के करीब नहीं आना चाहता ,क्योंकि यह सच्चाई अच्छाई लगभग समाप्ति की ओर है ।
किसी से पूछो “कैसे हो?” अँधेर कमरे में बैठा मन यही कहता है सब ठीक है पर वास्तविक रूप से सब कुछ बिखराव के साथ ही मिलता है ,,गलती से कोई भावुक हो भी जाए तो उसका दुख सुनकर लगता है कि कितना कुछ दूनियाँ भोग रही है यहां कोई किसी का रहनुमा नहीं रह गया है ।
सबके पास कहने को बहुत कुछ होता है पर सुनने वाला कोई नहीं। जब परिवार स्वतंत्र ना होकर एक साथ रहते थे तब दिन भर मेला सा लगता था और एक दूसरे से कहने सुनने वाले बहुत लोग थे तब पर तब ये मोबाइल नहीं थे,न ही इतने महत्वपूर्ण थे । एक दूसरे के साथ तब समय कब बीत जाता था पता ही नहीं चलता था । आज सब अपनी अपनी चार दिवारी के साथ अपने-अपने मोबाइल में कैद है।
कहां जाता था मुसीबत के वक्त आपका बनाया हुआ व्यवहार ही काम आता है ,अब यह विचार भी कहीं ना कहीं लुक तो होता जा रहा है लोग पैसे को महत्व ज्यादा देते हैं सबको लगता है कि पैसा हर गम की दवा है आज कंधे पर हाथ रखकर कोई यह कहने वाला नहीं होता कि तुम्हारे लिए मैं हूं ना,,,,,, फिर भी सब अपनी अपनी दुनियाँ में मस्त दिखाई देते हैं ! सच्चाई तो यह है फेसबुक और रील में खुश दिखने वाला अधिकांश वास्तविक दुनियाँ में बहुत अलग होता है।
मनुष्य सांसारिक प्राणी है यह समाज में रहता है , परिवार ,मित्र
इसके सहायक होते हैं,पर आज यह सब साथ साथ कहां किसी को प्राप्त है ,जलन , द्वेष और ईर्ष्या सब समाप्त कर चुकी है इसलिए अपने रिश्तों को संभाल कर रखिए,हर इंसान आज अकेला है
अपनी सोच, अपनी समझ , अपने व्यवहार के कारण ।
रिश्ते समझदारी से नहीं प्रेम से निभाए जाते हैं। आज यह अकेलापन ही कई लोगों के डिप्रेशन का कारण भी है ,,,,,
जो इंतजार में है कि कोई उनसे बस यह कहे ,,,,,, मैं हूं ना…।
आशी प्रतिभा
मध्य प्रदेश, ग्वालियर
भारत













