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सुबह का बिस्कुट नहीं

सुबह का बिस्कुट नहीं मैं जो अपने पेट भरने में मुझे गर्म चाय में डुबो दिया,,
अजीब बात है कि सुकून मिलता है राहत मिलती है,
मुझे जल्दी उठकर गर्म चाय में डुबोकर रखा
स्नेह मिलन समारोह नहीं है जो चुपचाप बैठे चुस्की लेते हुए एक एक करके खात्मा कर दिया।। मैं तो जां से गया और खाने वाले को याद भी न आया ।।
हेरानी तो इस बात की है, कि मैं उसकी पेट की आग बुझाने में लगा हुआ था,
और वो मुझे मिटानें में उतर आया,
मैं तेरा होकर जीवन कुर्बान कर गया,, और तुने मेरी फितरत का यह सिला दिया कि जले पर मेरे अपने होंठों से फुंक तक नहीं दिया।।।


अशोक सुमन भवानी मंडी,,,राज.

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