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कविता

यार की यारी है, जो मुझे बहुत याद आती है
उसके सीने में मैं हूं और मेरे सीने में वो है ,
हम इक दूजे की धड़कन बनकर रहते हैं
ज़वाब देने वाली यादें आज भी तन्हा है,
सुकून देने वाले दिन शर्मिंदा हैं ,

पूछें कोई हमसे
की दोस्ती किस को कहते हैं
यह कहां दूर देश में रहता है,
यह कौन सा परदेशी परिंदा हैं,
कब तक उसकी याद में जागतीं रहेगी मेरी ये अंखियां
कब तक हम खुली आंखों से देखते रहेंगे उनके सपने,
कि एक दिन जरूर आएगा मेरा यार,

एक इसी याद के साथ तो हम अब तक जिंदा हैं,

अशोक सुमन /
भवानी मंडी/ राज.

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