
राजस्थान की धरती फिर रोई,
एक तेरह बरस की बच्ची की चीख
आज भी अस्पताल की दीवारों में
न्याय की राह तक रही है।
जब सिया ने केतन को खाई में धक्का दिया,
पूरा समाज गरजा—
“लड़कियों से बचो…”
बहसें हुईं, फैसले सुनाए गए,
और हर बेटी पर उंगली उठी।
मैं उस अपराध का समर्थन नहीं करती,
जो भी अपराधी है,
उसे कठोर दंड मिलना ही चाहिए—
चाहे वह लड़की हो या लड़का।
पर आज पूछती हूँ—
जब एक मासूम बच्ची की अस्मिता रौंदी जाती है,
जब वह जीवन और मृत्यु से लड़ रही होती है,
तब वही शोर कहाँ चला जाता है?
क्यों हर बार
बेटियों के चरित्र पर पहरा,
और बेटों के अपराध पर चुप्पी?
हवस के सौदागरों,
याद रखो—
तुम्हारी दरिंदगी किसी एक बेटी पर नहीं,
पूरी इंसानियत पर हमला है।
कानून का तराज़ू
न स्त्री देखे, न पुरुष—
बस अपराध देखे।
समाज की संवेदना भी
एक-सी होनी चाहिए।
बेटी हो या बेटा,
अपराधी सिर्फ़ अपराधी होता है।
और पीड़ित—
सिर्फ़ न्याय का हक़दार इंसान।
आओ ऐसा समाज बनाएँ,
जहाँ किसी बेटी की चीख़
सुर्ख़ी बनने से पहले ही
दरिंदों के हाथ काँप जाएँ।
श्री ठाकुर देवघर झारखण्ड










