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योग और ध्यान

सूर्योदय से पूर्व उठो तुम,
नित्य नेम से होय निवृत्त।
खुली हवा में जाकर कीजे,
योगासन, व्यायाम सुचित्त।।

कम्बल, कुशा, घास का आसन,
जिससे सुख, भू समतल हो।
ओंकार की कीजे ध्वनि फिर,
प्राणायाम से मंगल हो।।

आज जिसे अनुलोम-विलोम कह,
करते बाल, किशोर व वृद्ध।
नर-नारी सब करें इसे नित,
जीवन सुखमय हो समृद्ध।।

हैं चौरासी सुनो आसनें,
कई तरह के हैं व्यायाम।
पी० टी० जो स्कूल में होतीं,
उनसे पावे तन-मन आराम।।

गुरु पतंजलि योग गुरु हैं,
प्राणायाम बताते हैं।
ऊँ मन्त्र की करें साधना,
कैसे? सभी बताते हैं।।

सभी आसनें वे बतलाते,
योगासन की पढ़ें किताब।
तरह-तरह के खेल, गतिविधि,
तन को स्वस्थ बनाते साब।।

सात्विक भोजन करें सभी नित,
हों विचार पावन, सुन्दर।
मातु-पिता, गुरु, बड़ों की सेवा,
करें सभी, हों पथ सुखकर।।

स्मृति होगी तीव्र, प्रखर फिर,
नया छितिज पर हो आलोक।
बुद्धि तेज हो नेत्र ज्योति भी,
सुख ही सुख हों, न कोई शोक।।

तन बलिष्ठ हो, मन एकाग्र हो,
ध्यान से हो दोनों निर्मल।
अंग-अंग मजबूत होय तब,
मन में दुविधा न निर्बल।।

माँसपेशियों में प्रसार हो,
रक्तगति का सही संचार।
नयन ज्योति हो पावन उर संग,
सृष्टि हेतु उमड़े उर प्यार।।

होय लचीले अंग ये कोमल,
अति मजबूत करें नित श्रम।
तन-मन में हो जोश नित्य ही,
कलाकार हों, टूटें भ्रम।।

ध्यान बुद्धि, उर पावन करता,
योग से हो तन-मन मजबूत।
मूलाधार सहित सब खुलते,
चक्र, ऊर्जावान सपूत।।

ध्यान हमारे अंतस को,
करता शुद्ध व ऊर्जावान।
अंग-अंग में भर बलिष्ठता,
देता गौरव व सम्मान।।

सारे रोग ध्यान से होते,
भस्म, चित्त निर्मल होता।
जैसे कोई नया बीज बो,
उगता नवअंकुर सोता।।

हो जाग्रत फिर धीरे-धीरे,
वही वृक्ष बन जाता है।
अपनी छाप सभी पर छोड़े,
सभी जगह छा जाता है।।

ध्यान-योग ये हृदय और,
मस्तिष्क मनुज हैं मानो।
जैसे सावन की फुहार,
कर देती शीतल जानो।।

रचनाकार-
जुगल किशोर त्रिपाठी (साहित्यकार)
बम्हौरी, मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)

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