
जीवन का गणित भी बडा अजीब सा खेल है
यह अंकगणित नही बीजगणित सा चलता है
याद करना और याद आना दोनों अलग बात है
याद हम उन्हें करते हैं जो हमारे अपने होते हैं
याद हम उन्हें आते है जो हमे अपना समझते हैं।
ये जीवन की नैय्या यूहीं चलती रहती है
कभी मंझधार में भंवर जाल में फंसती है
कभी लहरों संग सहेली बन पार उतरती है।
गोवर्धन थपलियाल













