
कर्म फल चाहे बिना, जोभी कर्म कर रहे।
सच में सन्यासी वही, योगी कहलाता है।।
योग अग्नि जले बिना, योगी नहीं होता कोई।
कर्म और योग दोनों, हरि पथ जाता है।।
एक बात ध्यान धर, कर मेरी बात सुनु।
ब्रह्म युक्त योगी ही, तो संत कहलाता है।।
दृढ़ता विहीन नर , योग नहीं कर पाए।
लेकर शपथ वह, भोगी बन जाता है।।













