
जो सच पूछें तो कोई रहा ही नही और कह दूं तो कुछ कहा भी नही।
तेरे हिस्से का मैं बचा ही कहां, और मेरे हिस्से का मैं रहा ही नही।।
अधूरी फिर कहानी है जो लगता नही सुनानी है सुनने को तो होना भी चाहिए! जब हैं ही नही तो कहा भी नही।।
वो फेहरिस्त गिले शिकवें की रही मुताबिक किसी के किसी की ही नही, गफलत कि सुन ले शायद कोई सुनने को भी तो कुछ रहा ही नही।।
इक आस प्यास सी काफी हैं, शायद की शायद बाक़ी है!ये मैं कि मेरी सुनता ही नही साकी कई जाम अभी बाक़ी है।।
मयखानों को कोई दोष न दो पीने वालो को कोई होश न दो; यह सब मरीज हैं वफाओं के इन्हे जाम वफा के नाम न दो।।
खाली खाली तस्दीक सी है बेरंग रंगीन तस्वीर सी है मैं दिखाई जिसमे दे न रहा देख मैं की मेरी तदबीर सी है।।
धुल गया हूं मैं किसी और ही के रंग तस्वीर सो हुई हैं यूं बदरंग तो रंगरेज को यूँ इल्ज़ाम न दो यह उसकी नही कहीं कोई तंज।।
ये तो बस वक्त की फर्माइश है, कि दिखती कोई गुंजाइश है, जो खर्च हूँ हुआ वो खुद का हुआ तेरी बचत की नुमाइश बाक़ी है।।
ये खेल ज़िन्दगी के स्कूल के ढंग,कोई समझे भी कैसे उसूल भी संग सब की परीक्षाएं बाक़ी है।जो दे दी गई वह नाकाफ़ी है।।
संदीप शर्मा सरल।।
देहरादून उत्तराखंड ।।











