सावन और शंकर का रिश्ता, यहाँ किसे भला ये ज्ञात नही।
हुआ समुद्रमंथन निकला विष
जिसे पीना सबके बस की बात नहीं।
यूं ही नहीं कोई भोला होता, सबको समझ ये आई नहीं।
दुनिया के हित की खातिर जिसे,
लगे हलाहल पीना सही।
कंठ किये हलाहल धारण,
जलन उसकी असहनीय हुई।
जब भोले पर ठंडा जल डाला,
तब से जलाभिषेक करने की,
सावन में प्रथा ये शुरू हुई।
तप उस देवी का नहीं साधारण,
जो सावन में वन में रही।
पाने अपने भोले शंकर को,
सारे कष्टों को सहती रही।
शिव सबको बचाने बने नीलकंठ।
शक्ति ने कठिन तपस्या की।
शिवशक्ति का वह कठिन समय,
था सावन का महिना ही।
जब जल के रूप में भक्तों का,
प्रेम बरसता है शिवजी के ऊपर।
हर्षित होते हैं शिव सावन में,
देख प्रेम भक्तों का उन पर।
शिवशक्ति धरती पर आकर,
सावन में रहते हैं।
अपने सभी भक्तों के घर वे,
जाकर घूमा करते हैं।
कष्टों को हम सबके हर कर,
सुख समृधि की बारिश करते हैं।
सावन के इस पावन अवसर पर,
जो भोले हैं उन पर भोले,
अपनी कृपा बरसाते हैं।
कठिन परिस्तिथि में धीरज धरने की ,
सीख सभी को देते हैं।
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे, सिवनी (म प्र)













