
रे मन गीत नहीं गाना अब
चाहे जितना अतल परख ले
चाहे कितना अम्बर छू ले
कह उस ओर नहीं जाना अब
वको ध्यान के मध्य विचरना
नहीं चेष्टा काक की करना
सुमति और सहकार बना तो
बस केवल चुपचाप गुज़रना
अर्थ खोखले थोथे अक्षर
तमस भरे जिनके अभ्यंतर
चंदन विष क्या लिपटाना अब ?
तुझे बेदख़ल ही होना था
उनके ग्रुप से और मंचों से
मान और अपमान पिए जा
सीख सका न कुछ चमचों से
इनकी संधि सुलह विज्ञापित
समझौते भी हैं स्थापित
चर्चा से क्या घबराना अब
दो कौड़ी के लेखन पर क्यों
बड़े बड़ों से टक्कर लेता ?
मति ही मारी गई हो जिसकी
उसको रक्षण कैसे मिलता ?
पत्थर के ये शहर अनोखे
छाया को भी देते धोखे
इस छल से क्या भरमाना अब ?
पत्रिकाओं में छपना वपना
देखें दूर देश का सपना
भिड़ी हुई है वहाँ भी तिकड़ी
खुली पोल तो क्या है ढकना ?
एक दूसरे को उकसाते
छींटा कसते व्यंग्य चलाते
मन को क्या है बहलाना अब ?
साम दाम और दंड भेद से
दुनिया के सब गोरख धंधे
रहा अनाड़ी जीवन भर तू
सावन हरा नहीं है अंधे
मित्र अमित्र हुए बहुतेरे
ये कब तेरे वे कब मेरे
तुझको फिर क्यों पछताना अब
गढ़ में सबके सेध लगाना
लिखने से भी बड़ी कला है
छुटभैये हैं बड़े खिलाड़ी
शिष्य गुरु से बड़ी बला है
बाँध मैत्री के टूटे हैं
बाज़ू अन्विति के छूटें हैं
जाए जहाँ जिसको जाना है अब।
के वी











