
ऋषियों की तप-धरा से, ज्ञान-ज्योति जगमगाए,
सत्य, संयम, सदाचार के, पथ पर मन चल पाए।
कर्मों की जो धूल जमी हो, अंतर्मन से धो लें,
ऋषि-वाणी के अमृत से हम, जीवन अपना खोलें।
सप्तऋषियों की पुण्य स्मृति, मन में दीप जलाती,
त्याग, तपस्या, सत्य-साधना की राह दिखाती।
अज्ञानों के तम को हरकर, चेतन दीप जलाएँ,
ऋषि-परंपरा के आदर्शों को, जीवन में अपनाएँ।
क्षमा, दया और प्रेम बने जब, जीवन का आधार,
मन निर्मल हो, कर्म पवित्र हों, यही सच्चा श्रृंगार।
बाह्य शुद्धि से बढ़कर होती, अंतर्मन की शुचिता,
ऋषि पंचमी दे हमें सदा, सद्बुद्धि और विनम्रता।
ज्ञान-साधना, लोक-कल्याण का, संदेश सदा दोहराएँ,
ऋषियों के उज्ज्वल संस्कारों से, मानवता महकाएँ।
ऋषियों के तप से सिंचित, संस्कृति की यह धारा,
सद्ज्ञानों से आलोकित हो, जीवन का हर किनारा।
वेद-वाणी की गूँज हृदय में, सत्य-दीप बन जाए,
स्वार्थ मिटे, सेवा का भाव हर श्वास में बस जाए।
पूर्वजों के पुण्य संस्कारों को श्रद्धा से अपनाएँ,
ऋषि पंचमी पर शुद्ध चेतना का नव-संकल्प उठाएँ।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा’ सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













