
एक वो अर्धनग्न फकीर चला,
लाठी ही उसका हथियार थी।
ना गोला, ना ही बारूद,
सत्य ही उसकी तलवार थी।।
साबरमती से उठी थी जो लौ,
वो दांडी मार्च तक आ गई थी।
मन्नू आज मुट्ठी भर नमक ने,
गौरों की हुकूमत को हिला दी।।
कहा था किसी ने हम से,
यह आसानी से संभव नहीं।
पर सच और अहिंसा से बड़ा,
कोई संबल भी तो नहीं।
2050 का यह युवा,
जब इतिहास पढ़ेगा।
सोचेगा क्या ऐसा इंसान भी,
सच में इस तरह से लड़ा था?
बिना वस्त्र, बिना ताज,
बिना किसी सिंहासन।
जीत लिया उसने तो,
हमारा अखण्ड हिंदुस्तान।।
उन्होने चरखा चलाया,
स्वदेश का मान बढ़ाया।
गरीब की हर झोपड़ी में,
आशा का नव दीप जलाया।।
गोली खाई अपने सीने पर,
पर ना हिंसा कभी अपनाई।
हे राम कह कर उसने,
अंतिम सांस भी यूं गाई।।
वह हमारा बापू था,
राष्ट्रपिता, युग निर्माता।
सत्य का पुजारी,
मानवता का त्राता।।
आज फिर जरूरत है हमें,
उस लाठी वाली राह की।
नफरत के इस दौर में,
प्रेम की चाह की।।
आओ हम सब मिलकर,
उस गांधी को याद करें,
सत्य और अहिंसा से ही,
भारत फिर आबाद करें।।
मुन्ना राम मेघवाल ‘भाटी’।
कोलिया,डीडवाना,राजस्थान।












