
हम जिन्हें राह दिखाने निकले।
लोग वो हमसे सयाने निकले।
बात करते हैं वो शराफ़त की,
लोग जो हद से पुराने निकले।
जो हमारे नहीं तुम्हारे भी नहीं,
आज वो सबके ठिकाने निकले।
वो फिसलना ,वो संभलना उनका,
ये तो सब उनके बहाने निकले ।
हमको अक्सर ही जो मिले तन्हा,
साथ उनके तो ज़माने निकले ।
जो सदाएं थी सभी भूली सी,
लोग फिर उनको सुनाने निकले।
बात सारी वो जानी-अनजानी,
आज फिर सबसे जताने निकले।
नवीन माथुर पंचोली












