
वह मौन नहीं,
मौन के भीतर उठती हुंकार है।
वह कोमल कली नहीं,
ऋतुओं की पहली बयार है।
पलकों पर केवल स्वप्न नहीं,
भविष्य के अक्षर पलते हैं।
उँगलियाँ तकदीर नहीं पढ़तीं—
नई इबारत लिखती हैं।
काँच की छत पर
उसने जब दस्तक दी।
दरारों से उतर आया
उजले आकाश का प्रकाश।
पत्थरों ने रोका तो
नदी ने राह बदलने से इनकार किया।
अपने ही प्रवाह से
किनारों का अर्थ बदल दिया।
न कृपा का सिंहासन चाहिए।
न दया का कोई पदक।
बस बराबरी की ज़मीन
और निर्णय का अधिकार चाहिए।
अब वह किसी की परछाईं नहीं
अपने अस्तित्व की धूप है—
नारी केवल विमर्श नहीं,
बदलते युग का स्वरूप है।
उसकी आवाज़ में अब
सदियों का मौन पिघलता है।
हर बंद दरवाज़े के आगे
एक नया रास्ता निकलता है।
वह अपने हिस्से का सूरज
मुट्ठी में भरकर चलती है।
अपने सपनों की धरती पर
अपना आकाश स्वयं रचती है।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार












