
कविता
मुझे गांधी जैसा बनना था
आज मुझे भी जिद्द चढ़ीं है कि
मुझे गांधी जैसा बनना है,
पर क्या करूं मन डरा डरा है ,
अब संत कहां,
अब किसे दिखाएं किसे कहें,
कहां को जाएं,
मुझे गांधी का पाठ पढ़ना था,
वो कहते हैं,
सत्य कहो पर,
सत्य कहीं दिखाई देता नहीं है,
झुठ मुठ का स्वांग रचा है,
अहिंसा की बात कही भी आज नजर कहां आती है,
मार काट काट में
रण सजा है,
डरता हूं मैं
समाज के ठैकेदारों से,
किससे कहूं
मुझे इतिहास गढ़ना था,
दो अक्टूबर को जो मैंने
देखा तो समझा सोया सारा आलम है,
सोई सारी शिक्षा से,
डर लगता है ,
वो दिन निकल जाता है,
पर वो सोएं सोएं रहते,
देर से सूरज निकलता है,
किसको कहूं कि
मुझे भी
गांधी जैसा बनना था,
गांधी जैसा बनना था।।
अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)










