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बदलते कल की नई दस्तक

विधा : पद्य
बदल रहा यह युग अब तो ,
बदल रहे तो अब तुम हो ।
बदलता युग यह देखकर ,
हो रहे क्यूॅं तुम ये गुम हो ।।
दिखता नहीं अपना बदलाव ,
जाने कहाॅं गुम यह मस्तक ।
सुन लो बुरी नजर वाले तुम ,
बदलते कल की नई दस्तक ।।
न‌ई दस्तक की नई है चुनौती ,
जाने प्यार यह या अहंकार ।
बचाएगा हमको ये डूबने से ,
या डूबो देगा हमे मजधार ।।
भाग रहे हम कलियुग देख ,
हमें देख कलियुग भाग रहा ।
आ रहा अब है सत्ययुग पुन: ,
सनातन संस्कृति जाग रहा ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।

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