
विधा : पद्य
कर स्वीकार तू कर ले प्यार ,
सृष्टि का शृंगार है उपकार ।
करुणा आधार निष्ठा का हार ,
सृष्टि में यह मिला उपहार ।।
तुम्हीं तो सृष्टि के कर्णधार ,
यही अपना मिला संस्कार ।
ईश्वर का भी है यही इशारा ,
संस्कार में बसा तेरा संसार ।।
सभ्यता का ये सजा बाजार ,
सभ्य बाजार सुंदर व्यवहार ।
हे सृष्टि में आए हुए पुजारी ,
सृष्ट दुनिया में पर उपकार ।।
पर उपकार ही परोपकार ,
पर उपकार जीवन उपचार ।
तू ही तो सृष्टि के सगे लाड़ले ,
सुंदर मुख से सुंदर हो उद्गार ।।
सार्थक होगा जीवन निखार ,
होगे पुष्पित पल्लवित अपार ।
तू यार हो यारों के भी तो यार ,
जीवन में तेरे बसे परोपकार ।।
हे मानव परंपरा के पालनहार ,
तू ही संस्कृति का सृजनहार ।
जिसके स्वागत में तुम हो ठार ,
कर रहा है स्वागत में इंतजार ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।











