
सत्य हमारी सत्यनिष्ठा से
ही हमें महसूस होता है,
यही सत्य हमारी ईमानदारी से
दूसरों को भी महसूस होता है।
किसी की सत्यनिष्ठा की सटीक
परीक्षा व्यक्ति पर निर्भर होती है,
कि अपने आत्मसम्मान के लिये
वो स्वयं कैसा आचरण करता है।
दिग्भ्रमित है जीवन वह,
कलुषित है कलंकित है,
इंसान की इंसानियत का
जिसमें न बोलबाला हो।
सत्य जो बिन कहे महसूस हो,
जो कह दिया वो शब्द हैं,
कहने योग्य यदि कटु हो और
न कह सके यही मर्यादा है।
किसी जमाने में एक बैलगाड़ी
पर बैठ कर अपने गाँव से,
शहर की कचहरी तक वादी
प्रतिवादी साथ साथ जाते थे।
आज जमाना है कि मुक़दमे
की पेशी पर यदि जाना पड़े,
तो पहुँचने में कोर्ट तक गोलियों
से भूनकर लाशें बिछ जाती हैं।
रिश्ते उम्र भर के मर्यादित होते हैं,
जब तभी सकुशल निभ पाते हैं,
वरना रिश्ते पेड़ के पत्तों की भाँति
आज हरे तो कल सूख जाते हैं।
रिश्ते निभाने के लिए अंधा, बहरा
और कभी गूँगा भी बनना पड़ता है,
राखी की लाज रिश्ते की डोर बने,
आदित्य रिश्ते को निभाना पड़ता है।
डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ












