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हृदय से प्यारी वरदायिनि माँ

माँ! मैं कभी लिख न पाऊं तो,
मेरी लेखनी बनकर आ जाना।
कभी कुछ सोच नहीं पाऊं तो,
मेरी माँ! मस्तिष्क में उतर आना।

कभी मैं हार न जाऊँ, मेरी माँ,
तो तुम विजय बनकर आ जाना।
कभी भी उदासी न आने पाये माँ,
तुम मेरी खुशी बनकर आ जाना।

कभी कहीं भटक जाऊँ, माँ तो,
हाथ पकड़ सही राह दिखलाना।
कभी कुछ याद न कर पाऊँ माँ,
तो तुम मेरी स्मृति में आ जाना।

मेरी हर परिस्थिति में जैसे भी हो,
मेरी माँ हमेशा मेरा साथ निभाना।
आदित्य की विनय हे शारदे माँ,
हृदय से प्यारी, वरदायिनि माँ।

डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

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