
आधी रात का शहर
दिन से बिल्कुल अलग होता है—
न उसके चेहरे पर
भीड़ का शोर होता है,
न रिश्तों की औपचारिक मुस्कान।
उसकी चौड़ी सड़कों पर
पीली रोशनियाँ तैरती हैं,
और गगनचुंबी इमारतों की
काँच की खिड़कियों में
हज़ारों बंद ज़िंदगियाँ
जगमगाती रहती हैं।
दिन में यही शहर
लोगों को दौड़ाता है,
रात में
उनकी थकान को पहचानता है।
एक तरफ
चमकते मॉल का बंद दरवाज़ा,
दूसरी तरफ
फुटपाथ पर सोता परिवार—
एक ही शहर में
दो अलग-अलग रातें।
कहीं देर से लौटती लड़की
अपने कदम तेज़ कर लेती है,
कहीं अस्पताल की सीढ़ियों पर
किसी के चेहरे पर
पूरी रात जागती चिंता बैठी है।
चौराहे पर खड़ा पुलिसकर्मी,
अंतिम सवारी तलाशता रिक्शावाला,
चाय की बुझती दुकान के पास
ऊँघता हुआ आदमी—
शहर की असली कहानी
इन्हीं चेहरों पर लिखी है।
और उन ऊँची इमारतों में
जहाँ खिड़कियाँ तारों जैसी चमकती हैं,
कितने ही कमरे ऐसे हैं
जहाँ कोई
अपने ही घर में
अजनबी बना बैठा है।
आधी रात को
शहर अपनी सजावट उतार देता है—
तब दिखाई देता है
उसका असली चेहरा।
वह चेहरा
जिस पर विकास की चमक भी है,
विस्थापन की धूल भी,
सपनों की रोशनी भी
और अकेलेपन की गहरी छाया भी।
फिर भी शहर जागता रहता है—
किसी एम्बुलेंस की आवाज़ में,
किसी माँ की प्रतीक्षा में,
किसी मजदूर की थकी चाल में,
किसी खिड़की के पीछे
अब भी जलती उम्मीद में।
शायद शहर की सबसे बड़ी पहचान
उसकी इमारतें नहीं,
वे धड़कते हुए लोग हैं
जो हर रात
टूटकर भी
सुबह होने तक
शहर को बचाए रखते हैं।
डॉ पल्लवी सिंह 'अनुमेहा'
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, मध्यप्रदेश












