
विश्व शिक्षक दिवस
शिक्षक अर्थात गुरु
विधा – काव्य
उक्ति – गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो माहेश्वर: गुरु साक्षात पारभृम्ह तस्मै श्री गुरवे नम: ,,,,,,,,,,,,
गुरु दैदीप्यमान दिव्य ज्योती है
जिसका प्रकाश अनमोल मोती है
गुरु ज्ञान का सागर है धरा की परछाई है
जिसके आगोश मे सारी दुनिया समाई है
गुरु एक निर्मल शीतल जल है
जिसके बूंद बूंद मे शीतलता पल पल है
गुरु जीवन रूपी नाव की पतवार है
भवसागर पार करवाने वाला खैवनहार है
गुरु जीवन का पथ प्रदर्शक होता है
हर मुकाम हर कठिनाई का दिग्दर्शक होता है
गुरु ही सांझ है गुरु ही प्रभात है
उगते सूरज की आस है अस्त होते सूरज की दिलास है
जीवन से लड़ने का संकल्प आप हो गुरु
हर कठिनाइयों का मुकाम आप हो गुरु
जीवन सधता नही जो साथ ना हो गुरु का
मंजिल मिल नही सकती जो आशीर्वाद ना हो गुरु का
है गुरु आपसे ही जीवन शुरु होता है।
पहला स्थान माँ बाप दूसरा गुरु ही होता है
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र











