
विधा – काव्य
अंत जब समीप होगा याद आयेगा तुझको तेरा धर्म
जीवन के इन चार दिनों में करता चल शुभ कर्म
सद्कर्मों का जटिल एक रास्ता
संभले पग से निभाता चल अपना धर्म
जीवन के इन चार दिनों में करता चल शुभ कर्म
जीवन इम्तिहान है पास फेल में मत गँवा अपना मर्म
जीवन के इन चार दिनों में करता चल शुभ कर्म
जीवन है अंत भी है जाने के फेर में विमुख ना होना ए वर्ण
जीवन के इन चार दिनों में करता चल शुभ कर्म
ईश्वर की नियामत ये जीवन पाप से सराबोर एक शर्म
जीवन के इन चार दिनों में करता चल शुभ कर्म
कर्म क्षेत्र ये जीवन है इसके पथ मूल में सिवा है कर्म
जीवन के इन चार दिनों में करता चल शुभ कर्म
अच्छा हो या बुरा नेमत उसकी जान निभाता चल अपना धर्म
जीवन के इन चार दिनों में करता चल शुभ कर्म
चौरासी लाख योनियो के बाद मिलता है मानव कर्म
जीवन के इन चार दिनों में करता चल शुभ कर्म
ज्ञान नहीं वास्तविकता का आधार सारात्व का है अभिमंत्र
जीवन के इन चार दिनों में करता चल शुभ कर्म
जीवन प्रेम की परिभाषा एक जीवन की अभिलाषा किरण
जीवन के इन चार दिनों में करता चल शुभ कर्म
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र











