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कविता

दिन के अंधेरे में जगा तो रात की लालटेन के उजाले में आदमी को ढुंढता रहा ,

अंधेरगर्दी है हर तरफ लटकी हुई इंसानियत हर तरफ,

इंसान को इंसान में उतर कर उसे ढूंढने लगा,

जैसे रेतीले मरुस्थल में पानी के वजूद को,

तपती गर्मी में धुप की तेज़ चाक पर ज़िंदगी को तलाशने चला,

खारा हे और गहरा है समंदर,
छोर नहीं है उस ओर,

इधर के किनारे पर खड़े होकर उधर का किनारा झांकने लगा,

साहिल की रेत पर,
दम तोड़ती लहरों को पत्थर पर जींदा होने के अहसास को निहारते हुए खुद को तलाशने चला,

कहां जाऊं और कहां तलाश करूं ,

कि मैं कौन हूं?

किधर गया वो आदमी जिसके पास कभी आदमी बैठा करता था,

कितना बोना हो गया है आदमी,
आदमी ही आदमी को नज़र नहीं आ रहा ,

कुदरत को ललकार कर हिदायतों तोड़ कर अहम्
में जीने लगा,

रिश्ता दम तोड़ती सांसें गिन रहा है ,

संस्कार दुबक कर बैठा कहीं सहमा हुआ,

शिक्षा तो इतनी बड़ी हो गई है कि दशानन ज्ञानी को भी ललकार दे,

मां बाप भाई बहन दुश्मन हो गएं है आजकल,

पराये लोग है अपने खास हो गएं आजकल ,

अपनी ज़िन्दगी को (पत्नी , मां बाप भाई बहन),, आजकल,

जीते जी जिंदा जलाया जा रहा है आजकल,

आंखों के सामने ही अपने घर वालों को ठुकराते है आजकल ,

हंस हंस कर दिल जला रहे हैं आजकल।।

अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)

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