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हिंदू त्योहारों का मज़ाक कब तक?

पता नहीं क्यों, आजकल कुछ लोगों ने हमारे हिंदू त्योहारों को मज़ाक बनाने का माध्यम बना लिया है।

आज मैं एक रील देख रहा था। उसमें एक महिला के तीन पति दिखाए गए हैं। वह तीनों के लिए करवा चौथ का व्रत रखती है, तीनों के हाथों से पानी पीती है, मिठाई खाती है और फिर घर चली जाती है। जब उसके तीनों पति उसे घर में नहीं पाते, तो उसे ढूँढ़ने निकल पड़ते हैं। कुछ देर बाद जब वह मिलती है, तो किसी चौथे व्यक्ति के साथ दिखाई देती है।

आखिर ऐसा क्यों? हमारे त्योहारों और हमारी धार्मिक भावनाओं को मज़ाक का विषय क्यों बनाया जा रहा है?

करवा चौथ केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि अनेक हिंदू परिवारों के लिए प्रेम, विश्वास, आस्था और वैवाहिक रिश्ते की गरिमा का प्रतीक है। ऐसे पवित्र पर्व को इस तरह प्रस्तुत करना क्या केवल मनोरंजन है?

क्या आज कुछ लोगों के लिए लाइक्स, व्यूज़ और पैसे कमाना इतना ज़रूरी हो गया है कि वे हमारी संस्कृति और परंपराओं की गरिमा को भी भूल गए हैं?

यह केवल एक रील का मामला नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों का अपमान करने वाली उस मानसिकता का सवाल है, जो मनोरंजन के नाम पर हर पवित्र भावना को मज़ाक में बदल देना चाहती है।

मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि सवाल किसी महिला या पुरुष के विरुद्ध नहीं है। सवाल उस सोच के विरुद्ध है, जो हमारी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं को सस्ती लोकप्रियता पाने का साधन बना देती है।

सरकार और संबंधित नियामक संस्थाओं को भी ऐसे कंटेंट पर ध्यान देना चाहिए। यदि कोई सामग्री कानून का उल्लंघन करती है या जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाती है, तो उसकी उचित जाँच होनी चाहिए और कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबको है, लेकिन स्वतंत्रता के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी आती है। मनोरंजन के नाम पर किसी की आस्था, संस्कृति और परंपराओं का अपमान करना उचित नहीं कहा जा सकता।

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम ऐसी मानसिकता को पहचानें और उसका विरोध करें, जो समाज में विश्वास, रिश्तों और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति उपहास को बढ़ावा देती है।

आखिर हम अपने त्योहारों की गरिमा की रक्षा के लिए आवाज़ कब उठाएँगे?

हमारा विरोध मनोरंजन से नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक मूल्यों का अपमान करने वाली मानसिकता से है, जो समाज की आस्था को केवल मज़ाक समझती है।

धर्म का सम्मान हो, महिलाओं की गरिमा बनी रहे और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जिम्मेदारी से इस्तेमाल हो।

आर. एस. लॉस्टम

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