
माना कि आज हर कोई धनतेरस मना रहें हैं लेकिन आज भी कोई धन के लिए तरस रहें हैं,
शायद बेरोजगारी हो सकता है या कोई मजबूरी हो सकता है लेकिन कुछ भी हो सकता है।
एक ही दिन और एक समय है लेकिन किसीके चेहरे पर खुशी है तो कोई आंसू बहा रहा है,
क्या यही है दिवाली कहीं पर पटाखे की शोर है और कहीं कोई गुमशुदा बैठा हैं।
क्योंकि जहाँ महंगे महंगे लाईट हो वहाँ एक माटी का दीया ही रौशनी दे सकता है,
क्योंकि इस दीपावली की दीया मेरे घर की अंधेरे को दूर अवश्य करेगी यह मेरा मानना है
बस इतनी सी समझने वाली बात है कहीं खुशी तो कहीं गम है कहाँ आप है और कहाँ हम हैं।
चन्दे पासवान उर्फ अलबेला जी मधुबनी बिहार से,













